योगी आनंद द्वारा भगवती दुर्गा की प्रार्थना

हे माते! तू सर्वज्ञ है क्योंकि सबके भीतर स्थित आत्मा है तू। तेरी सत्ता चहुंओर और अनंत है। तू ब्रह्मा में रचनात्मक शक्ति, विष्णु में पालन-पोषण की शक्ति, एवं शिव में संहारक शक्ति के रूप में स्थित है। तेरे अनंत नाम व रूप हैं। शब्द, चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षान्ति (सहिष्णुता), जाति, … Continue reading योगी आनंद द्वारा भगवती दुर्गा की प्रार्थना

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सच्चा योग और सच्चा योगी

बहुत ही थोडे लोग सत्य को प्रेम करते हैं, और उन थोडे लोगों मे कोइ विरला ही परम् सत्य तक पहुंच पाता है। परम सत्य की उपलब्धि ही जीवन् साधना का उद्देश्य है। अपनी दृष्टि को पवित्र किये विना सत्य को हम देख नहीं सकते। दृष्टि को धूमिल करते हैं – काम, क्रोध् और अहंकार … Continue reading सच्चा योग और सच्चा योगी

आत्मनिष्ठा से अभय, और अभय से आत्मनिष्ठा

आत्मनिष्ठा से अभय आता है और अभय से आत्मानिष्ठा आती है, इसीलिये उपनिषद् कहता है – “अभयम् ब्रह्म” अभय स्थिति ही आत्मा व ब्रह्म है | किसी भी प्रकार का भय तनाव उत्पन्न करता है, और तनाव आत्मा अर्थात शान्ति सुख आनन्द से दूर ले जाता है | भय तनाव पैदा करता है, तनाव मन … Continue reading आत्मनिष्ठा से अभय, और अभय से आत्मनिष्ठा