प्रस्तुत है एक शास्त्रार्थ श्री योगी आनन्द जी एवं श्री सुभाष चन्द्र अग्रवाल जी के बीच, निम्नलिखित एक फ़ेसबुक पोस्ट के उपर, दिनांक – ३० मई २०१७ को:

“तुम यहां कितनी भी चालाकियां कर लो, वहां कोई भी चालाकी नहीं चलती।”

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : कहां?

योगी आनन्द : वहां से मेरा तात्पर्य धर्मजगत, सत्य जगत व ईश्वरीय जगत से है।

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : क्या आपने उसे देखा है? कन तरीका से देखा,और किसने दिखाया ?

योगी आनन्द : अध्यात्म योग से, और परमआत्मा ने दिखाया।

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : ये अध्यात्म का विषय ही नही, ये तत्त्वज्ञान का विषय है।

योगी आनन्द : आत्मा परम तत्व है। उससे बढ़कर कोई तत्व नहीं। आत्मतत्व के अन्तर्गत ही सभी तत्व निहित हैं। वह आदि मध्य और अंत है। सारे लोक आत्मलोक से अवेश्टित है। आप आत्मा, जो सत्य है, से भिन्न और तत्व की बात करते हैं वह मिथ्या ही हो सकता है। धर्म, सत्य, ईश्वर, आत्मा ये भिन्न नहीं बल्कि एक ही हैं, इनमें ननात्व है ही नहीं। हमारे श्रोत्रिय ऋषिगण कहते हैं, मृत्यु: स मृत्युम आप्नोति य ईह नानेव पश्यति अर्थात वे मृत्यु से मृत्यु को बार बार प्राप्त होते हैं जो नानात्व देखते हैं |

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : आत्मा भी निकलती है। प्रकट होती है परमात्मा से।

योगी आनन्द : वस्तुतः आत्मा और परमात्मा में कोई भी तात्विक भेद नहीं है। पहली बात आत्मा और परमात्मा में भेद अज्ञान के कारण है। दूसरी बात जिसे लोग परमात्मा का अंश, आत्मा कहते हैं, वह आत्मा है ही नहीं, वह तो प्राण है। जिसे हम व्यक्ति कहते हैं, वह आत्मा नहीं बल्कि प्राण है।

यह कथन कि “आत्मा भी निकलती है। प्रकट होती है परमात्मा से” सर्वथा अज्ञानपूर्ण है। आत्मा कभी पैदा नहीं होती है, इसलिए मरने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। जो व्यक्त होता है और जिसे व्यक्ति कहते हैं, अर्थात जो जन्म और मृत्यु को प्राप्त होता है वह प्राण है, आत्मा नहीं। उसे आत्मा कहना अत्यंत अज्ञानतापूर्ण है। आत्मा तो कभी व्यक्त होता ही नहीं है। आत्मा अखंड पूर्ण और परम है। आत्मा को कभी खंडित नहीं किया जा सकता; यदि वह ऐसा प्रतीत होता है तो अज्ञानता के कारण। इसके साथ ही यह कथन भी असत्य हो जाता है की “परमात्मा सारे तत्वो को पैदा करता है। ” गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है – अव्यक्तोऽयम अचिन्त्योऽयम अविकार्योऽयमुच्यते (२,२५). अर्थात यह अव्यक्त है, यह अचिन्त्य है, यह अविकारी है। इससे कभी कोई विकार उत्पन्न हो ही नहीं सकता।

आत्मा व परमात्मा अव्यक्त, अक्षर, अविकारी, अखंड, सत्य, अनंत है। श्रुति भी कहती है – अयं आत्मा ब्रह्म, यह आत्मा ब्रह्म है। तत्वमसि, तुम वही हो, अर्थात तुम्हारा सत्य वही है।

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : आत्मा का नाम रुप स्थान देखने का तरिका और कार्य व्यवाहार, बताने की कृपा करें।

योगी आनन्द : आत्मा का कोई नाम नहीं, वह अनाम है। आत्मा का कोई रूप नहीं, क्योंकि वह अरूप है। आत्मा का कोई एक नियत स्थान नहीं, क्योंकि वह सर्वगत, सार्वभौमिक और सर्वव्यापी है। आत्मा का कोई व्यवहार नहीं क्योंकि वह शान्तं शिवम् अद्वैतं, अव्यवहार्यं, प्रपञ्चोपशमं है। यह केवल बात नहीं बल्कि सत्य है। और इसका साक्षात्कार तभी संभव है जब हम शांत, दान्त, उपरत, तितिक्षु व समाहित चित्त स्थिति को प्राप्त करते हैं; नान्यः पन्थाः विद्यते अयनाय, कोई और मार्ग नहीं है।

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : आत्मा और ब्रह्म तो एक ही है, परमब्रह्म नही लिखा है।

योगी आनन्द : ये सभी शब्दभेद हैं। ये विशेषण, काल स्थान रूप के अंतर्गत ही आते हैं। आत्मा-परमात्मा, ब्रह्म-परब्रह्म, ईश्वर-परमेश्वर, ये सभी अखंड और अद्वैत हैं। साधकों को शब्दों, रूपों और विशेषणों से भ्रमित नहीं होना चाहिए। सभी में एक ही आत्म,परमात्म,ब्रह्म,ईश्वर तत्त्व का अवलोकन करना चाहिए तभी अद्वैत की स्थिति प्राप्त हो पायेगी। विजिज्ञासा (skepticism ) दस बेड़ियों में से एक प्रबल बेड़ी है। इनसे बचें, अन्यथा सत्य जगत में गति कठिन हो जाएगी।

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : ज्योति रुप कौन है, जिसे चैतन्य ज्योति कहते है? और साधना से किसे देखा जाता है, जो जलती नही सूखती न हो, कटती नही? ब्रह्मक्षेत्र मे कोन रहता है?

योगी आनन्द : आत्म-साधना में किसी को देखने की साधना नहीं की जाती है। आत्मा स्वयं चक्षु है, चक्षु अपने आपको के नहीं देख सकती, बल्कि अन्य को देखती है। ध्यान की अवस्था में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है वह आत्मा व पुरुष नहीं बल्कि प्राण व प्रकृति जगत की वस्तुएँ होती हैं।

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : आप भगवान के बनाये संसार को अल्प ज्ञान से भ्रमित मत कीजिये।

योगी आनन्द : मुझे अल्पज्ञान है आपको कैसे पता ? इसका मतलब तो ये हुआ की आपको ब्रह्म ज्ञान है, इसलिए आप ये जज कर सकते हैं। आप सुनी सुनाई बातों को मानकर ही बैठे हैं, और भ्रम-जाल में उलझे हुए हैं, आपको अनुभव नहीं है, ये सुस्पष्ट दीखता है। और भ्रमवश ही बहुत ही सीधी सादी बात को निरर्थक प्रश्न पूछकर उलझा दिया और मित्रों को भ्रमित कर दिया।

मेरा कथन कि “तुम यहां कितनी भी चालाकियां कर लो, वहां कोई भी चालाकी नहीं चलती।” बहुत ही सीधा और साफ़ है, इसमें आपको कैसे भ्रम और संशय हो गया? ये तो लक्षण भ्रमित चित्त का ही है। ऐसे चित्त से तो आप बाह्य जगत के तथ्यों को भी नहीं समझ पाएंगे, अंतर्जगत की तो बात ही अलग है, अंतर्जगत में बिलकुल प्रवेश नहीं कर पाएंगे ऐसे चित्त के साथ। बहुत सरल सुस्पष्ट और स्वच्छ चित्त चाहिए अंतर्जगत के रहस्यों को समझने के लिए।

अच्छा होगा अपने वाग्विलास को आप विराम दें। ॐ!

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : आप परमात्मा के अस्तित्व को मिटाना चाहते हैं हम भगवद् दूत आपको समझाते है आप अपना अहंकार दिखा रहे हैं, आपको परमात्मा ही ठीक करेगा|

योगी आनन्द : आप तो बहुत ही बचकानी बात करते हैं। मैंने जितनी भी बातें कही हैं सभी श्रुतिसम्मत कही हैं, और सभी आत्मा व परमात्मा के वास्तविक सत्य व अस्तित्व की पुष्टि करती हैं। फिर भी आप अपनी चालाक बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं को भगवद दूत एवं मुझे नास्तिक सिद्ध करने की असफल चेष्टा कर रहे हैं। अहंकार क्या होता है, और इसकी क्या उपयोगिता है किंचित आप नहीं समझते हैं। श्रुति एवं श्रोत्रिय योगीगण अपने अहम् को आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म, सत्य में स्थापित करने को कहते हैं। हमारा असली अहम् तो वही है, जो वस्तुतः अहंकार रहित अहम् है, जो केवल व्यवहार के लिए ही प्रयुक्त होता है। मुझे लगता है आपको अभी तक कोई श्रोत्रिय योगीगुरु का सान्निध्य प्राप्त नहीं हुआ है जो आपको आत्मा के रहस्य को समझा पाए। यदि मैं गलत हूँ तो निश्चित ही परमात्मा मुझे ठीक करेंगे, परन्तु कोई भी प्रामाणिक योगीगुरु, मेरे किसी भी बातों में, मुझे गलत या अप्रमाणिक सिद्ध करें तो मैं तत्क्षण अपने आपको ठीक करलूं। मुझे दीखता नहीं है की कोई भी बात मैंने अप्रमाणिक या मनगढंत बातें कही हैं।

आप श्रुतियों का श्रवण मनन निदिध्यासन करें तो मेरी बातें स्पष्ट हो पाएंगी। अस्तु। ॐ!

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : बार बार ॐ, ॐ भगवान है क्या? ॐ तो भगवान का पोता है।

योगी आनन्द : आपकी बातों से मुझे स्पष्ट हो गया कि आप समझने नहीं बल्कि समझाने के लिए ये बेसिरपैर की बातें लिख रहे हैं।  

आप ओम को भगवान का पोता बता रहे हैं, इससे कोई भी आपकी बालसुलभ चेतना को समझ सकता है।

निश्चित ही आप समझना नहीं चाह रहे हैं।

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : कृपया निद्धियासन के बारे मे बतावेंगे ये क्या होता है?

योगी आनन्द : “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो” – बृहदारण्यक उपनिषद
आत्मा के बारे में श्रवण, मनन और ध्यान के द्वारा जो एकत्व का अनुभव करने की चरम अवस्था है उसे निदिध्यासन कहते हैं।

“शास्त्रचार्यानुभवनैर्हेतुभिश्च समर्थितः| ईदृगैकात्म्यसंबोधो निदिध्यासनमुच्यते || “
श्रुति अथवा वेद-उपनिषद् में वर्णित आत्मा के रहस्य को आचार्य से सुनकर उस स्थिति में अचल निष्ठा को निदिध्यासन कहते हैं।

“श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि | निदिध्यासं लक्षगुणम् अनन्तं निर्विकल्पकम् ||”
सुनने से सौ गुणा श्रेयस्कर मनन होता है, मनन से सौ गुणा श्रेयस्कर निदिध्यासन है, और निर्विकल्प अनंतगुणा श्रेयस्कर है।

सुभाष चन्द्र अग्रवाल : आपको जानकारी नही है तो जानकार मत बनिये, यही आपकी विमूढता है। निदिध्यासन की जानकारी परमात्मा को होती है ।

योगी आनन्द : आप तो विमूढ़ता की हद पार कर गए। निदिध्यासन की उपर्युक्त परिभाषाएं एवं विवरण मेरे नहीं हैं, महर्षि याज्ञवल्क्य, एवं अन्य वैदिक ऋषियों के हैं, आप मुझे नहीं, बल्कि उनको विमूढ़ कह रहे हैं। ये तो ऐसे ही हो गया, जैसे कोई दीपक चला सूर्य को प्रकाशित करने, या कोई व्यक्ति क्रोध में आकर सिर के ऊपर स्थित सूर्य के ऊपर थूक फेंके, जो आखिर में उसके ऊपर ही गिरता है।

धन्य हैं, आपकी भी विमूढ़ता हद पार कर गयी। ज्ञान का सम्बन्ध उम्र से नहीं होता है। आप शायद इसी अहंकार में अज्ञानी रह गए। अब कृपया बस कीजिये, अपनी कूड़ा कचरा को यहाँ मत फेकिये।

परमात्मा आपको सद्बुद्धि प्रदान करे। ॐ!

 

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